Saturday, June 20, 2026

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नन्हे कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ: किताबों की जगह ठेलिया थामने को मजबूर मासूम

नन्हे कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ: किताबों की जगह ठेलिया थामने को मजबूर मासूम

 

 

 

पयागपुर (बहराइच)। कहते हैं बचपन खेलने-कूदने, सीखने और सपनों को पंख देने की उम्र होती है, लेकिन गरीबी और मजबूरी कई मासूमों से उनका बचपन छीन लेती है। ऐसा ही एक मार्मिक दृश्य विकासखंड पयागपुर के पयागपुर बस स्टॉप पर देखने को मिला, जहां करीब दस वर्षीय एक मासूम बच्चा ठेलिया पर कबाड़ लादकर अपने जीवन की जरूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद करता नजर आया।

जिस उम्र में उसके हाथों में किताबें और कॉपी होनी चाहिए थीं, उस उम्र में उसके नन्हे कंधों पर जिम्मेदारियों का भारी बोझ दिखाई दिया। बच्चा ठेलिया खींचकर कबाड़ इकट्ठा कर रहा था। बातचीत करने पर उसने मासूमियत से बताया कि “पेट की मजबूरी है, इसलिए काम करना पड़ता है।”

यह दृश्य समाज और प्रशासन दोनों के लिए एक गंभीर सवाल खड़ा करता है कि आखिर आज भी कई बच्चे शिक्षा और बचपन के अधिकार से वंचित होकर मजदूरी करने को मजबूर क्यों हैं। सरकार द्वारा बच्चों की शिक्षा और कल्याण के लिए अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन जरूरत है कि ऐसे जरूरतमंद बच्चों तक इन योजनाओं का लाभ सही समय पर पहुंचे।

यह मासूम भी अपने भीतर अनगिनत सपने लिए हुए है। जरूरत केवल किसी सहारे, संवेदना और उचित मार्गदर्शन की है, ताकि उसके हाथों में ठेलिया नहीं बल्कि पेन कापी‌ किताब होनी चाहिए।

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नन्हे कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ: किताबों की जगह ठेलिया थामने को मजबूर मासूम

नन्हे कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ: किताबों की जगह ठेलिया थामने को मजबूर मासूम

 

 

 

पयागपुर (बहराइच)। कहते हैं बचपन खेलने-कूदने, सीखने और सपनों को पंख देने की उम्र होती है, लेकिन गरीबी और मजबूरी कई मासूमों से उनका बचपन छीन लेती है। ऐसा ही एक मार्मिक दृश्य विकासखंड पयागपुर के पयागपुर बस स्टॉप पर देखने को मिला, जहां करीब दस वर्षीय एक मासूम बच्चा ठेलिया पर कबाड़ लादकर अपने जीवन की जरूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद करता नजर आया।

जिस उम्र में उसके हाथों में किताबें और कॉपी होनी चाहिए थीं, उस उम्र में उसके नन्हे कंधों पर जिम्मेदारियों का भारी बोझ दिखाई दिया। बच्चा ठेलिया खींचकर कबाड़ इकट्ठा कर रहा था। बातचीत करने पर उसने मासूमियत से बताया कि “पेट की मजबूरी है, इसलिए काम करना पड़ता है।”

यह दृश्य समाज और प्रशासन दोनों के लिए एक गंभीर सवाल खड़ा करता है कि आखिर आज भी कई बच्चे शिक्षा और बचपन के अधिकार से वंचित होकर मजदूरी करने को मजबूर क्यों हैं। सरकार द्वारा बच्चों की शिक्षा और कल्याण के लिए अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन जरूरत है कि ऐसे जरूरतमंद बच्चों तक इन योजनाओं का लाभ सही समय पर पहुंचे।

यह मासूम भी अपने भीतर अनगिनत सपने लिए हुए है। जरूरत केवल किसी सहारे, संवेदना और उचित मार्गदर्शन की है, ताकि उसके हाथों में ठेलिया नहीं बल्कि पेन कापी‌ किताब होनी चाहिए।

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