Saturday, June 20, 2026

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जौनपुर: शाही ईदगाह में शांतिपूर्ण संपन्न हुई ईद-उल-अजहा की नमाज, इमाम ने बताया कुर्बानी का महत्व

रिपोर्ट– प्रदेश संवाददाता पत्रकार अतुल कुमार तिवारी 

बेनकाब भ्रष्टाचार न्यूज़ BBN

जौनपुर 

मछली शहर पड़ाव स्थित शाही ईदगाह में ईद-उल-अजहा (बकरीद) की नमाज पूरी अकीदत और शांतिपूर्ण माहौल में सकुशल संपन्न हुई। शाही ईदगाह के इमाम एवं खतीब हज़रत मौलाना अब्दुज़ ज़ाहिर सिद्दीकी हन्फी ने हजारों नमाजियों को नमाज अदा करवाई।

हज़रत इब्राहिम की सुन्नत (इतिहास)मौलाना अब्दुज़ ज़ाहिर सिद्दीकी ने अपने खुतबे (भाषण) में बताया कि कुर्बानी की शुरुआत अल्लाह के नबी हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की सुन्नत से हुई। अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम के जज्बे को आजमाने के लिए उनकी सबसे प्रिय चीज—उनके बेटे हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम की कुर्बानी मांगी थी। हज़रत इब्राहिम ने अल्लाह के हुक्म के आगे सिर झुका दिया। जब वे अपने बेटे की गर्दन पर छुरी चलाने लगे, तो अल्लाह ने उनके इस समर्पण को कुबूल कर लिया और जिब्रील अलैहिस्सलाम के जरिए वहां एक दुम्बा (नर भेड़) भेज दिया। बेटे की जगह उस दुम्बे की कुर्बानी हुई। इसी महान समर्पण की याद में पिछले पांच हजार साल से हर साल बकरीद मनाई जाती है। उन्होंने आगे कहा कि नमाज हमेशा ईदगाह में पढ़े ताकि मुसलमानों के

 

शानो शौकत का इजहार हो।

ईदगाह में नमाज पढ़ना खुले मैदान में ईद और ईद उल अजहा की नमाज पढ़ना सुन्नत है।

कुर्बानी क्यों और कैसे हो (इस्लामी और कानूनी तरीका) इमाम साहब ने खुतबे में जोर दिया कि कुर्बानी केवल एक रस्म नहीं, बल्कि अपनी सबसे प्यारी चीज अल्लाह की राह में कुर्बान करने का जज्बा है। लोगों ने अपनी आर्थिक हैसियत के अनुसार हलाल कमाई से खरीदे गए जानवरों की कुर्बानी दी।

कुर्बानी करने का सही तरीका:

जानवर की सेहत: जानवर पूरी तरह स्वस्थ, तंदुरुस्त और बिना किसी शारीरिक ऐब (जैसे अंधापन, लंगड़ापन) के होना चाहिए।

तीन हिस्से: कुर्बानी के गोश्त के तीन बराबर हिस्से किए जाते हैं—एक हिस्सा गरीबों और मिस्कीनों के लिए, दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों व पड़ोसियों के लिए और तीसरा हिस्सा खुद के परिवार के लिए।

साफ-सफाई का ध्यान: प्रशासन के निर्देशों के तहत कुर्बानी सार्वजनिक रास्तों या खुले स्थानों पर करने से बचें।अवशेषों का निस्तारण: कुर्बानी के बाद बचे हुए अवशेषों और गंदगी को खुले में न फेंकें, बल्कि उन्हें गड्ढा खोदकर मिट्टी में दबाएं या नगर पालिका के कचरा वाहनों को सौंपें।

सोशल मीडिया पर पाबंदी: किसी भी प्रतिबंधित जानवर की कुर्बानी न करें और न ही कुर्बानी की तस्वीरें या वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करें, जिससे किसी की भावनाएं आहत हों।

प्रशासन की मुस्तैदी और राजनीतिक हलचल

मुस्तैद अफसर: शासन की मंशा के अनुरूप सुरक्षा के कड़े इंतजाम रहे और सभी प्रशासनिक अधिकारी मौके पर डटे रहे।

 

पंडाल पर जोर: मुख्य विपक्षी दल के नेता और कार्यकर्ता ईदगाह के बाहर लगे पंडालों पर नमाजियों का स्वागत करते और अपनी उपस्थिति दर्ज कराते नजर आए।

 

उत्साहित बच्चे: त्योहार को लेकर बच्चों में भारी उत्साह दिखा, वे नए कपड़ों में एक-दूसरे से गले मिलते नजर आए।

इस मौके पर मुख्य रूप से नेयाज ताहिर शेखू,मोहम्मद शोएब अच्छू खान,ज़फ़र राजा,रियाजुल हक़,हाजी इमरान खान,मौलाना आफाक,अकरम मंसूरी,आदि मौजूद रहे।

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जौनपुर: शाही ईदगाह में शांतिपूर्ण संपन्न हुई ईद-उल-अजहा की नमाज, इमाम ने बताया कुर्बानी का महत्व

रिपोर्ट– प्रदेश संवाददाता पत्रकार अतुल कुमार तिवारी 

बेनकाब भ्रष्टाचार न्यूज़ BBN

जौनपुर 

मछली शहर पड़ाव स्थित शाही ईदगाह में ईद-उल-अजहा (बकरीद) की नमाज पूरी अकीदत और शांतिपूर्ण माहौल में सकुशल संपन्न हुई। शाही ईदगाह के इमाम एवं खतीब हज़रत मौलाना अब्दुज़ ज़ाहिर सिद्दीकी हन्फी ने हजारों नमाजियों को नमाज अदा करवाई।

हज़रत इब्राहिम की सुन्नत (इतिहास)मौलाना अब्दुज़ ज़ाहिर सिद्दीकी ने अपने खुतबे (भाषण) में बताया कि कुर्बानी की शुरुआत अल्लाह के नबी हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की सुन्नत से हुई। अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम के जज्बे को आजमाने के लिए उनकी सबसे प्रिय चीज—उनके बेटे हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम की कुर्बानी मांगी थी। हज़रत इब्राहिम ने अल्लाह के हुक्म के आगे सिर झुका दिया। जब वे अपने बेटे की गर्दन पर छुरी चलाने लगे, तो अल्लाह ने उनके इस समर्पण को कुबूल कर लिया और जिब्रील अलैहिस्सलाम के जरिए वहां एक दुम्बा (नर भेड़) भेज दिया। बेटे की जगह उस दुम्बे की कुर्बानी हुई। इसी महान समर्पण की याद में पिछले पांच हजार साल से हर साल बकरीद मनाई जाती है। उन्होंने आगे कहा कि नमाज हमेशा ईदगाह में पढ़े ताकि मुसलमानों के

 

शानो शौकत का इजहार हो।

ईदगाह में नमाज पढ़ना खुले मैदान में ईद और ईद उल अजहा की नमाज पढ़ना सुन्नत है।

कुर्बानी क्यों और कैसे हो (इस्लामी और कानूनी तरीका) इमाम साहब ने खुतबे में जोर दिया कि कुर्बानी केवल एक रस्म नहीं, बल्कि अपनी सबसे प्यारी चीज अल्लाह की राह में कुर्बान करने का जज्बा है। लोगों ने अपनी आर्थिक हैसियत के अनुसार हलाल कमाई से खरीदे गए जानवरों की कुर्बानी दी।

कुर्बानी करने का सही तरीका:

जानवर की सेहत: जानवर पूरी तरह स्वस्थ, तंदुरुस्त और बिना किसी शारीरिक ऐब (जैसे अंधापन, लंगड़ापन) के होना चाहिए।

तीन हिस्से: कुर्बानी के गोश्त के तीन बराबर हिस्से किए जाते हैं—एक हिस्सा गरीबों और मिस्कीनों के लिए, दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों व पड़ोसियों के लिए और तीसरा हिस्सा खुद के परिवार के लिए।

साफ-सफाई का ध्यान: प्रशासन के निर्देशों के तहत कुर्बानी सार्वजनिक रास्तों या खुले स्थानों पर करने से बचें।अवशेषों का निस्तारण: कुर्बानी के बाद बचे हुए अवशेषों और गंदगी को खुले में न फेंकें, बल्कि उन्हें गड्ढा खोदकर मिट्टी में दबाएं या नगर पालिका के कचरा वाहनों को सौंपें।

सोशल मीडिया पर पाबंदी: किसी भी प्रतिबंधित जानवर की कुर्बानी न करें और न ही कुर्बानी की तस्वीरें या वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करें, जिससे किसी की भावनाएं आहत हों।

प्रशासन की मुस्तैदी और राजनीतिक हलचल

मुस्तैद अफसर: शासन की मंशा के अनुरूप सुरक्षा के कड़े इंतजाम रहे और सभी प्रशासनिक अधिकारी मौके पर डटे रहे।

 

पंडाल पर जोर: मुख्य विपक्षी दल के नेता और कार्यकर्ता ईदगाह के बाहर लगे पंडालों पर नमाजियों का स्वागत करते और अपनी उपस्थिति दर्ज कराते नजर आए।

 

उत्साहित बच्चे: त्योहार को लेकर बच्चों में भारी उत्साह दिखा, वे नए कपड़ों में एक-दूसरे से गले मिलते नजर आए।

इस मौके पर मुख्य रूप से नेयाज ताहिर शेखू,मोहम्मद शोएब अच्छू खान,ज़फ़र राजा,रियाजुल हक़,हाजी इमरान खान,मौलाना आफाक,अकरम मंसूरी,आदि मौजूद रहे।

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